Showing posts with label Amish. Show all posts
Showing posts with label Amish. Show all posts

Sunday, 25 October 2015

इक्ष्वाकु के वंशज (अमिश)

अमिश का रामायण आधारित उपन्यास 

Ikshwaku ke Vanshaj (Amish)
मेलुहा के मृत्युंजय, नागाओं का रहस्य और वायुपुत्रों की शपथ की अपर सफलता के बाद अमिश की राम पर आधारित एक नयी श्रृंखला 

३4०० ईसापूर्व, भारत

अलगावों से अयोध्या कमज़ोर हो चुकी थी. एक भयंकर युद्ध अपना कर वसूल रहा था. नुक्सान बहुत गहरा था. लंका का राक्षस राजा, रावण पराजित राज्यों पर अपना शासन लागू नहीं करता था. बल्कि वह वहां के व्यापार को नियंत्रित करता था. साम्राज्य से सारा धन चूस लेना उसकी नीति थी. जिससे सप्तसिंधु की प्रजा निर्धनता, अवसाद और दुराचरण में घिर गई. उन्हें किसी ऐसे नेता की ज़रूरत थी, जो उन्हें दलदल से बाहर निकाल सके. नेता उनमें से ही कोई होना चाहिए था. कोई ऐसा जिसे वो जानते हों. एक संतप्त और निष्कासित राजकुमार. एक राजकुमार जो इस अंतराल को भर सके. एक राजकुमार जो राम कहलाए.

वह अपने देश से प्यार करते हैं. भले ही उसके वासी उन्हें प्रताड़ित करें. वह न्याय के लिए अकेले खड़े हैं. उनके भाई, उनकी सीता और वह खुद इस अंधकार के समक्ष दृढ़ हैं.क्या राम उस लांछन से ऊपर उठ पाएंगे, जो दूसरों ने उन पर लगाए हैं ?क्या सीता के प्रति उनका प्यार, संघर्षों में उन्हें थाम लेगा?क्या वह उस राक्षस का खात्मा कर पाएंगे, जिसने उनका बचपन तबाह किया?क्या वह विष्णु की नियति पर खरा उतरेंगे?

डाऊनलोड करें- इक्ष्वाकु के वंशज





Thursday, 8 October 2015

वायुपुत्रों की शपथ (Vayuputron ki Shapath)- अमीश




यह शिव नाम के एक कबाइली हीरो की कहानी है, जो इंसान से भगवान तक का सफर तय करता है। शिव यहां अपनी पौराणिक गाथा से अलग एक नए एडवेंचर में दिखते हैं। कहानी में जबर्दस्त ड्रामा, सस्पेंस, एंटरटेनमेंट और झटकेबाजी है, जो पाठक को बांधे रखती है। लेकिन कहानी का वक्त आज का नहीं, हजारों बरस पहले का है, जब भारत में भगवान राम का बनाया हुआ मेलुहा साम्राज्य हुआ करता था। यानी यह शिव की मॉडर्न कथा नहीं है। इसे एक नया पुराण या मिथक कहा जा सकता है।

शिव अपनी शक्तिया जुटा रहा है। वह नागाओ की राजधानी पंचवटी पहुचता है और अंततः बुराई का रहस्य सामने आता है। नीलकंठ अपने वास्तविक शत्रु के विरुद्ध धर्मा युद्ध की तैयारी करता है। एक ऐसा शत्रु जिसका नाम सुनते ही बड़े से बड़ा योद्धा थर्रा जाता है।

एक के बाद एक होने वाले नृशंश युद्ध से भारतवर्ष की चेतना दहल उठेगी। ये युद्ध भारत पर हावी होने का षड्यंत्र है| अपने साहस से वह वायुपुत्र तक पहुचता है, जो अब तक उसे अपनाने को तैयार नहीं थे।

क्या वह सफल हो पायेगा? और बुराई से लड़ने का क्या मूल्य चुकाना पड़ेगा भारतवर्ष को? और शिव की आत्मा को?


डाऊनलोड करें- वायुपुत्रों की शपथ

Monday, 5 October 2015

नागाओं के रहस्य (Nagaon ke Rahasya)




शिव! महादेव। देवों के देव। बुराई के विनाशक। भावुक प्रेमी। भीषण योद्धा। सम्पूर्ण नर्तक। चमत्कारी मार्ग दर्शक। सर्व-शक्तिमान, फिर भी सच्चरित्र। कुषाग्रबुद्धि और साथ ही साथ उतनी ही शीघ्रता और भयंकर रूप से क्रुद्ध होने वाले।

कई शताब्दियों से – विजेता, व्यापारी, विद्वान्, शासक, पर्यटक – जो भी हमारी भूमि पर आए, उनमें से किसी ने भी यह विश्वास नहीं किया था कि ऐसे महान् व्यक्ति सचमुच में ही अस्तित्व में थे। उनकी कल्पना रही थी कि वे पौराणिक गाथाओं के कोई ईश्वर रहे होंगे, जिनका अस्तित्व मात्र मानवीय कल्पनाओं के क्षेत्राधिकार में ही संभव हो सकता था। दुर्भाग्यवश यह विश्वास ही हमारा प्रचलित ज्ञान बन गया।

लेकिन अगर हम गलत हैं? अगर भगवान् शिव एक अच्छी कल्पना से कपोल-कल्पित नहीं थे, बल्कि रक्त एवं मांस के बने एक व्यक्ति थे। आपके और मेरे समान ही। ऐसे व्यक्ति जो अपने कर्म के कारण ईश्वर के समान हो गए हों। यही इस शिव रचना त्रय का आधार वाक्य है जो ऐतिहासिक तथ्यों के साथ-साथ काल्पनिक कथा का मिश्रण कर प्राचीन भारत की पौराणिक धरोहर की व्याख्या करता है।

यह पुस्तक भगवान् शिव को एवं उनके जीवन को एक श्रद्धांजलि है, जो हमें ढेर सारी शिक्षाएँ देती है। वे शिक्षाएँ जो समय एवं अज्ञानता की गहराई में खो गई थीं। वह शिक्षा जिससे हम सभी लोग एक बेहतर मनुष्य बन सकते हैं। वह शिक्षा कि प्रत्येक जीवित व्यक्ति में एक संभावित ईश्वर का वास होता है। हमें मात्र इतना करना है कि स्वयं को सुनना है।

मेलूहा के मृत्युंजय रचना त्रय की प्रथम पुस्तक है जो एक असाधारण नायक की जीवन यात्रा का वृत्तांत है। यह दूसरी पुस्तक है, जिसका नाम है – नागाओं का रहस्य। इस पुस्तक का हिंदी में अनुवाद विश्वजीत ‘सपन’ ने किया है।


डाऊनलोड करें- नागाओं के रहस्य

Sunday, 4 October 2015

मेलुहा के मृत्युंजय (Meluha ke Mrityunjai)- अमीश



1900 ईसवी पूर्व, जिसे आधुनिक भारतीय सिन्धु घाटी सभ्यता के नाम से कह जाने की गलती कर बैठते हैं।
उस समय के निवासी उस भूमि को मेलूहा के नाम से पुकारते थे - इस साम्राज्य की स्थापना भारत के सबसे महान् सम्राट प्रभु श्रीराम ने कई शताब्दियों पूर्व की थी।
एक समय गर्वशील रहे इस साम्राज्य एवं इसके सूर्यवंशी शासकों ने कई संकटों का सामना किया था क्योंकि उनकी प्राथमिक नदी पवित्र सरस्वती शनैः-शनैः सूखती हुई मृतप्राय होती जा रही है। पूर्व दिशा से अर्थात् चन्द्रवंशियों के साम्राज्य की ओर से वे अत्यंत ही विध्वंसक आतंकवादी आक्रमणों का सामना कर रहे हैं। चकित कर देने वाली एवं दुःखदायी बात यह प्रतीत होती है कि चन्द्रवंशियों ने उन नागाओं से समझौता कर लिया है जो मानव जाति में जाति बहिष्कृत एवं अशुभ जाति थी, किन्तु उनके पास अद्भुत युद्ध कौशल है।

सूर्यवंशियों की आस मात्र एक पौराणिक गाथा पर टिकी है - ‘जब बुराई एक महाकाय रूप धारण कर लेती है, जब ऐसा प्रतीत होता है कि सब कुछ लुप्त हो चुका है कि आपके शत्रु विजय प्राप्त कर लेंगे, तब एक महानायक अवतरित होगा।’

क्या वह रूखा एवं खुरदुरा तिब्बती प्रवासी शिव सचमुच ही महानायक है?

और क्या वह महानायक बनना भी चाहता है अथवा नहीं?

अपने प्रारब्ध एवं कर्त्तव्य की ओर खिंच जाने वाले एवं साथ ही प्रेम से प्रेरित शिव क्या सूर्यवंशियों के प्रतिशोध में उनका नेतृत्व करेंगे और बुराइयों का नाश करेंगे?

यह शिव पर रचना-त्रय की प्रथम पुस्तक है। शिव एक साधारण मनुष्य है जिसके कर्म उसे देवों के देव महादेव में परिवर्तित कर देते हैं।


डाऊनलोड करें- मेलुहा के मृत्युंजय