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Sunday, 6 December 2015

विपथगा (अज्ञेय)


Vipathga (Agyey)

अज्ञेय जी का प्रथम कहानी संग्रह 

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Thursday, 12 November 2015

बंद गली का आखिरी मकान - धर्मवीर भारती


Band Gali ka Akhiri Makan by Dharmveer Bharti 

यह भी बहुत दिलचस्प ढंग है। वर्षों तक साहित्य में कहानी, नयी कहानी, साठोत्तरी कहानी, अकहानी आदि-आदि को लेकर बहस चलती रहे। लिखनेवाला चुप रहे। वर्षों तक चुप रहे और फिर चुपके से एक कहानी लिखकर प्रकाशित करा दे, और वही उसका घोषणा-पत्र हो, गोया उसने सारे वाद-विवाद के बीच एक रचनात्मक कीर्तिमान स्थापित कर दिया हो, कि देखो यह है कहानी..बन्द गली का आखिरी मकान, प्रकाशित होने पर जो तमाम पत्र लेखक को मिले उनमें से एक पत्र का यह अंश भारती की कथा-यात्रा की दिलचस्प झलक पेश करता है। भारती ने वर्षों के अन्तराल पर इस संकलन की कहानियाँ लिखी लेकिन हर कहानी अपनी जगह पर मुकम्मिल एक? क्लासिक? बनती गयी। ये कहानियाँ आप केवल पढ़कर पूरी नहीं करते,यो कहानियाँ कहीं बहुत गहरे पैठकर आपकी जीवन-दृष्टि को पूरी और गहरी बना जाती है। इनमें कुछ ऐसा है जो आप पढ़कर ही जान पाएँगे। प्रस्तुत है इस कृति का नवीन संस्करण।

गुलकी बन्नो

‘‘ऐ मर कलमुँहे !’ अकस्मात् घेघा बुआ ने कूड़ा फेंकने के लिए दरवाजा खोला और चौतरे पर बैठे मिरवा को गाते हुए देखकर कहा, ‘‘तोरे पेट में फोनोगिराफ उलियान बा का, जौन भिनसार भवा कि तान तोड़ै लाग ? राम जानै, रात के कैसन एकरा दीदा लागत है !’’ मारे डर के कि कहीं घेघा बुआ सारा कूड़ा उसी के सर पर न फेक दें, मिरवा थोड़ा खिसक गया और ज्यों ही घेघा बुआ अन्दर गयीं कि फिर चौतरे की सीढ़ी पर बैठ, पैर झुलाते हुए उसने उल्टा-सुल्टा गाना शुरू कर किया, ‘‘तुमें बछ याद कलते अम छनम तेरी कछम !’’ मिरवा की आवाज़ सुनकर जाने कहाँ से झबरी कुतिया भी कान-पूँछ झटकारते आ गयी और नीचे सड़क पर बैठकर मिरवा का गाना बिलकुल उसी अन्दाज़ में सुनने लगी जैसे हिज़ मास्टर्स वॉयस के रिकार्ड पर तसवीर बनी होती है।


अभी सारी गली में सन्नाटा था। सबसे पहले मिरवा (असली नाम मिहिरलाल) जागता था और आँख मलते-मलते घेघा बुआ के चौतरे पर आ बैठता था। उसके बाद झबरी कुतिया, फिर मिरवा की छोटी बहन मटकी और उसके बाद एक-एक कर गली के तमाम बच्चे-खोंचेवाली का लड़का मेवा, ड्राइवर साहब की लड़की निरमल, मनीजर साहब के मुन्ना बाबू-सभी आ जुटते थे। जबसे गुलकी ने घेघा बुआ के चौतरे पर तरकारियों की दुकान रखी थी तब से यह जमावड़ा वहाँ होने लगा था। उसके पहले बच्चे हकीमजी के चौतरे पर खेलते थे। धूप निकलते गुलकी सट्टी से तरकारियाँ ख़रीदकर अपनी कुबड़ी पीठ पर लादे, डण्डा टेकती आती और अपनी दुकान फैला देती। मूली, नीबू, कद्दू, लौकी, घिया-बण्डा, कभी-कभी सस्ते फल ! मिरवा और मटकी जानकी उस्ताद के बच्चे थे जो एक भंयकर रोग में गल-गलकर मरे थे और दोनों बच्चे भी विकलांग, विक्षिप्त और रोगग्रस्त पैदा हुए थे। सिवा झबरी कुतिया के और कोई उनके पास नहीं बैठता था और सिवा गुलकी के कोई उन्हें अपनी देहरी या दुकान पर चढ़ने नहीं देता था।


आज भी गुलकी को आते देखकर पहले मिरवा गाना छोड़कर, ‘‘छलाम गुलकी !’’ और मटकी अपने बढ़ी हुई तिल्लीवाले पेट पर से खिसकता हुआ जाँघिया सँभालते हुए बोली, ‘‘एक ठो मूली दै देव ! ए गुलकी !’’ गुलकी पता नहीं किस बात से खीजी हुई थी कि उसने मटकी को झिड़क दिया और अपनी दुकान लगाने लगी। झबरी भी पास गयी कि गुलकी ने डण्ड उठाया। दुकान लगाकर वह अपनी कुबड़ी पीठ दुहराकर बैठ गयी और जाने किसे बुड़बुड़ाकर गालियाँ देने लगी। मटकी एक क्षण चुपचाप रही फिर उसने रट लगाना शुरू किया, ‘‘एक मूली ! एक गुलकी !...एक’’ गुलकी ने फिर झिड़का तो चुप हो गयी और अलग हटकर लोलुप नेत्रों से सफेद धुली हुई मूलियों को देखने लगी। इस बार वह बोली नहीं। चुपचाप उन मूलियों की ओर हाथ बढ़ाया ही था कि गुलकी चीख़ी, ‘‘हाथ हटाओ। छूना मत। कोढ़िन कहीं की ! कहीं खाने-पीने की चीज देखी तो जोंक की तरह चिपक गयी, चल इधर !’’ मटकी पहले तो पीछे हटी पर फिर उसकी तृष्णा ऐसी अदम्य हो गयी कि उसने हाथ बढ़ाकर एक मूली खींच ली। गुलकी का मुँह तमतमा उठा और उसने बाँस की खपच्ची उठाकर उसके हाथ पर चट से दे मारी ! मूली नीचे गिरी और हाय ! हाय ! हाय !’’ कर दोनों हाथ झटकती हुई मटकी पाँव पटकपटक कर रोने लगी। ‘‘जावो अपने घर रोवो। हमारी दुकान पर मरने को गली-भर के बच्चे हैं-’’ गुलकी चीख़ी ! ‘‘दुकान दैके हम बिपता मोल लै लिया। छन-भर पूजा-भजन में भी कचरघाँव मची रहती है !’’ अन्दर से घेघा बुआ ने स्वर मिलाया। ख़ासा हंगामा मच गया कि इतने में झबरी भी खड़ी हो गयी और लगी उदात्त स्वर में भूँकने। ‘लेफ्ट राइट ! लेफ्ट राइट !’ चौराहे पर तीन-चार बच्चों का जूलूस चला आ रहा था। आगे-आगे दर्जा ‘ब’ में पढ़नेवाले मुन्ना बाबू नीम की सण्टी को झण्डे की तरह थामे जलूस का नेतृत्व कर रहे थे, पीछे थे मेवा और निरमल। जलूस आकर दूकान के सामने रूक गया। गुलकी सतर्क हो गयी। दुश्मन की ताक़त बढ़ गयी थी।

मटकी खिसकते-खिसकते बोली, ‘‘हमके गुलकी मारिस है। हाय ! हाय ! हमके नरिया में ढकेल दिहिस। अरे बाप रे !’’ निरमल, मेवा, मुन्ना, सब पास आकर उसकी चोट देखने लगे। फिर मुन्ना ने ढकेलकर सबको पीछे हटा दिया और सण्टी लेकर तनकर खड़े हो गये। ‘‘किसने मारा है इसे !’’

‘‘हम मारा है !’’ कुबड़ी गुलकी ने बड़े कष्ट से खड़े होकर कहा, ‘‘का करोगे ? हमें मारोगे !’’ मारोगे !’’ मारेंगे क्यों नहीं ?’’ मुन्ना बाबू ने अकड़कर कहा। गुलकी इसका कुछ जवाब देती कि बच्चे पास घिर आये। मटकी ने जीभ निकालकर मुँह बिराया, मेवा ने पीछे जाकर कहा, ‘‘ए कुबड़ी, ए कुबड़ी, अपना कूबड़ दिखाओ !’’ और एक मुट्ठी धूल उसकी पीठ पर छोड़कर भागा। गुलकी का मुँह तमतमा आया और रूँधे गले से कराहते हुए उसने पता नहीं क्या कहा। किन्तु उसके चेहरे पर भय की छाया बहुत गहरी हो रही थी। बच्चे सब एक-एक मुट्ठी धूल लेकर शोर मचाते हुए दौड़े कि अकस्मात् घेघा बुआ का स्वर सुनाई पड़ा, ‘‘ए मुन्ना बाबू, जात हौ कि अबहिन बहिनजी का बुलवाय के दुई-चार कनेठी दिलवायी !’’ ‘‘जाते तो हैं !’’ मुन्ना ने अकड़ते हुए कहा, ‘‘ए मिरवा, बिगुल बजाओ।’’ मिरवा ने दोनों हाथ मुँह पर रखकर कहा, ‘‘धुतु-धुतु-धू।’’ जलूस आगे चल पड़ा और कप्तान ने नारा लगाया:

अपने देस में अपना राज ! 

गुलकी की दुकान बाईकाट !


नारा लगाते हुए जलूस गली में मुड़ गया। कुबड़ी ने आँसू पोंछे, तरकारी पर से धूल झाड़ी और साग पर पानी के छींटे देने लगी।

गुलकी की उम्र ज़्यादा नहीं थी। यही हद-से-हद पच्चीस-छब्बीस। पर चेहरे पर झुर्रियाँ आने लगी थीं और कमर के पास से वह इस तरह दोहरी हो गयी थी जैसे अस्सी वर्ष की बुढ़िया हो। बच्चों ने जब पहली बार उसे मुहल्ले में देखा तो उन्हें ताजुज्ब भी हुआ और थोड़ा भय भी। कहाँ से आयी ? कैसे आ गयी ? पहले कहाँ थी ? इसका उन्हें कुछ अनुमान नहीं था ? निरमल ने ज़रूर अपनी माँ को उसके पिता ड्राइवर से रात को कहते हुए सुना, ‘‘यह मुसीबत और खड़ी हो गयी। मरद ने निकाल दिया तो हम थोड़े ही यह ढोल गले बाँधेंगे। बाप अलग हम लोगों का रुपया खा गया। सुना चल बसा तो डरी कि कहीं मकान हम लोग न दखल कर लें और मरद को छोड़कर चली आयी। खबरदार जो चाभी दी तुमने !’’

‘‘क्या छोटेपन की बात करती हो ! रूपया उसके बाप ने ले लिया तो क्या हम उसका मकान मार लेंगे ? चाभी हमने दे दी है। दस-पाँच दिन का नाज-पानी भेज दो उसके यहाँ।’’

‘‘हाँ-हाँ, सारा घर उठा के भेज देव। सुन रही हो घेघा बुआ !’’


‘‘तो का भवा बहू, अरे निरमल के बाबू से तो एकरे बाप की दाँत काटी रही।’’ घेघा बुआ की आवाज़ आयी-‘‘बेचारी बाप की अकेली सन्तान रही। एही के बियाह में मटियामेट हुई गवा। पर ऐसे कसाई के हाथ में दिहिस की पाँचै बरस में कूबड़ निकल आवा।’’

‘‘साला यहाँ आवे तो हण्टर से ख़बर लूँ मैं।’’ ड्राइवर साहब बोले, ‘‘पाँच बरस बाद बाल-बच्चा हुआ। अब मरा हुआ बच्चा पैदा हुआ तो उसमें इसका क्या कसूर ! साले ने सीढ़ी से ढकेल दिया। जिन्दगी-भर के लिए हड्डी खराब हो गयी न ! अब कैसे गुजारा हो उसका ?’’

‘‘बेटवा एको दुकान खुलवाय देव। हमरा चौतरा खाली पड़ा है। यही रूपया दुइ रूपया किराया दै देवा करै, दिन-भर अपना सौदा लगाय ले। हम का मना करित है ? एत्ता बड़ा चौतरा मुहल्लेवालन के काम न आयी तो का हम छाती पर धै लै जाब ! पर हाँ, मुला रुपया दै देव करै।’’


दूसरे दिन यह सनसनीख़ेज ख़बर बच्चों में फैल गयी। वैसे तो हकीमजी का चबूतरा पड़ा था, पर वह कच्चा था, उस पर छाजन नहीं थी। बुआ का चौतरा लम्बा था, उस पर पत्थर जुड़े थे। लकड़ी के खम्भे थे। उस पर टीन छायी थी। कई खेलों की सुविधा थी। खम्भों के पीछे किल-किल काँटे की लकीरें खींची जा सकती थीं। एक टाँग से उचक-उचककर बच्चे चिबिड्डी खेल सकते थे। पत्थर पर लकड़ी का पीढ़ा रखकर नीचे से मुड़ा हुआ तार घुमाकर रेलगाड़ी चला सकते थे। जब गुलकी ने अपनी दुकान के लिए चबूतरों के खम्भों में बाँस-बाँधे तो बच्चों को लगा कि उनके साम्राज्य में किसी अज्ञात शत्रु ने आकर क़िलेबन्दी कर ली है। वे सहमे हुए दूर से कुबड़ी गुलकी को देखा करते थे। निरमल ही उसकी एकमात्र संवाददाता थी और निरमल का एकमात्र विश्वस्त सूत्र था उसकी माँ। उससे जो सुना था उसके आधार पर निरमल ने सबको बताया था कि यह चोर है। इसका बाप सौ रूपया चुराकर भाग गया। यह भी उसके घर का सारा रूपया चुराने आयी है। ‘‘रूपया चुरायेगी तो यह भी मर जाएगी।’’ मुन्ना ने कहा, ‘‘भगवान सबको दण्ड देता है।’’ निरमल बोली ‘‘ससुराल में भी रूपया चुराये होगी।’’ मेवा बोला ‘‘अरे कूबड़ थोड़े है ! ओही रूपया बाँधे है पीठ पर। मनसेधू का रूपया है।’’ ‘‘सचमुच ?’’ निरमल ने अविश्वास से कहा। ‘‘और नहीं क्या कूबड़ थोड़ी है। है तो दिखावै।’’ मुन्ना द्वारा उत्साहित होकर मेवा पूछने ही जा रहा था कि देखा साबुनवाली सत्ती खड़ी बात कर रही है गुलकी से-कह रही थी, ‘‘अच्छा किया तुमने ! मेहनत से दुकान करो। अब कभी थूकने भी न जाना उसके यहाँ। हरामजादा, दूसरी औरत कर ले, चाहे दस और कर ले। सबका खून उसी के मत्थे चढ़ेगा। यहाँ कभी आवे तो कहलाना मुझसे। इसी चाकू से दोनों आँखें निकाल लूँगी !’’

बच्चे डरकर पीछे हट गये। चलते-चलते सत्ती बोली, ‘‘कभी रूपये-पैसे की जरूरत हो तो बताना बहिना !’’


कुछ दिन बच्चे डरे रहे। पर अकस्मात् उन्हें यह सूझा कि सत्ती को यह कुबड़ी डराने के लिए बुलाती है। इसने उसके गु़स्से में आग में घी का काम किया। पर कर क्या सकते थे। अन्त में उन्होंने एक तरीक़ा ईजाद किया। वे एक बुढ़िया का खेल खेलते थे। उसको उन्होंने संशोधित किया। मटकी को लैमन जूस देने का लालच देकर कुबड़ी बनाया गया। वह उसी तरह पीठ दोहरी करके चलने लगी। बच्चों ने सवाल जवाब शुरू कियेः

‘‘कुबड़ी-कुबड़ी का हेराना ?’’

‘‘सुई हिरानी।’’

‘‘सुई लैके का करबे’’

‘‘कन्था सीबै! ’’

‘‘कन्था सी के का करबे ?’’

‘‘लकड़ी लाबै !’’

‘‘लकड़ी लाय के का करबे ?’’

‘‘भात पकइबे! ’’

‘‘भात पकाये के का करबै ?’’

‘‘भात खाबै !’’

‘‘भात के बदले लात खाबै।’’

और इसके पहले कि कुबड़ी बनी हुई मटकी कुछ कह सके, वे उसे जोर से लात मारते और मटकी मुँह के बल गिर पड़ती, उसकी कोहनिया और घुटने छिल जाते, आँख में आँसू आ जाते और ओठ दबाकर वह रूलाई रोकती। बच्चे खुशी से चिल्लाते, ‘‘मार डाला कुबड़ी को । मार डाला कुबड़ी को।’’ गुलकी यह सब देखती और मुँह फेर लेती।


एक दिन जब इसी प्रकार मटकी को कुबड़ी बनाकर गुलकी की दुकान के सामने ले गये तो इसके पहले कि मटकी जबाव दे, उन्होंने ने अनचिते में इतनी ज़ोर से ढकेल दिया कि वह कुहनी भी न टेक सकी और सीधे मुँह के बल गिरी। नाक, होंठ और भौंह ख़ून से लथपथ हो गये। वह ‘‘हाय ! हाय !’’ कर इस बुरी तरह चीख़ी कि लड़के कुबड़ी मर गयी चिल्लाते हुए सहम गये और हतप्रभ हो गये। अकस्मात् उन्होंने देखा की गुलकी उठी । वे जान छोड़ भागे। पर गुलकी उठकर आयी, मटकी को गोद में लेकर पानी से उसका मुँह धोने लगी और धोती से खून पोंछने लगी। बच्चों ने पता नहीं क्या समझा कि वह मटकी को मार रही है, या क्या कर रही है कि वे अकस्मात् उस पर टूट पड़े। गुलकी की चीख़े सुनकर मुहल्ले के लोग आये तो उन्होंने देखा कि गुलकी के बाल बिखरे हैं और दाँत से ख़ून बह रहा है, अधउघारी चबूतरे से नीचे पड़ी है, और सारी तरकारी सड़क पर बिखरी है। घेघा बुआ ने उसे उठाया, धोती ठीक की और बिगड़कर बोलीं, ‘‘औकात रत्ती-भर नै, और तेहा पौवा-भर। आपन बखत देख कर चुप नै रहा जात। कहे लड़कन के मुँह लगत हो ?’’ लोगों ने पूछ तो कुछ नहीं बोली। जैसे उसे पाला मार गया हो। उसने चुपचाप अपनी दुकान ठीक की और दाँत से खू़न पोंछा, कुल्ला किया और बैठ गयी।

उसके बाद अपने उस कृत्य से बच्चे जैसे खु़द सहम गये थे। बहुत दिन तक वे शान्त रहे। आज जब मेवा ने उसकी पीठ पर धूल फेंकी तो जैसे उसे खू़न चढ़ गया पर फिर न जाने वह क्या सोचकर चुप रह गयी और जब नारा लगाते जूलूस गली में मुड़ गया तो उसने आँसू पोंछे, पीठ पर से धूल झाड़ी और साग पर पानी छिड़कने लगी। लड़के का हैं गल्ली के राक्षस हैं !’’ घेघा बुआ बोलीं। ‘‘अरे उन्हें काहै कहो बुआ ! हमारा भाग भी खोटा है !’’ गुलकी ने गहरी साँस लेकर कहा....।

इस बार जो झड़ी लगी तो पाँच दिन तक लगातार सूरज के दर्शन नहीं हुए। बच्चे सब घर में क़ैद थे और गुलकी कभी दुकान लगाती थी, कभी नहीं, राम-राम करके तीसरे पहर झड़ी बन्द हुई। बच्चे हकीमजी के चौतरे पर जमा हो गये। मेवा बिलबोटी बीन लाया था और निरमल ने टपकी हुई निमकौड़ियाँ बीनकर दुकान लगा ली थी और गुलकी की तरह आवाज़ लगा रही थी, ‘‘ले खीरा, आलू, मूली, घिया, बण्डा !’’ थोड़ी देर में क़ाफी शिशु-ग्राहक दुकान पर जुट गये। अकस्मात् शोरगुल से चीरता हुआ बुआ के चौतरे से गीत का स्वर उठा बच्चों ने घूम कर देखा मिरवा और मटकी गुलकी की दुकान पर बैठे हैं। मटकी खीरा खा रही है और मिरवा झबरी का सर अपनी गोद में रखे बिलकुल उसकी आँखों में आँखें डालकर गा रहा है।


तुरन्त मेवा गया और पता लगाकर लाया कि गुलकी ने दोनों को एक –एक अधन्ना दिया है दोनों मिलकर झबरी कुतिया के कीड़े निकाल रहे हैं। चौतरे पर हलचल मच गयी और मुन्ना ने कहा, ‘‘निरमल ! मिरवा-मटकी को एक भी निमकौड़ी मत देना। रहें उसी कुबड़ी के पास !’’ ‘‘हाँ जी !’’ निरमल ने आँख चमकाकर गोल मुंह करके कहा, ‘‘हमार अम्माँ कहत रहीं उन्हें छुयो न ! न साथ खायो, न खेलो। उन्हें बड़ी बुरी बीमारी है। आक थू !’’ मुन्ना ने उनकी ओर देखकर उबकायी जैसा मुँह बनाकर थूक दिया।

गुलकी बैठी-बैठी सब समझ रही थी और जैसे इस निरर्थक घृणा में उसे कुछ रस-सा आने लगा था। उसने मिरवा से कहा, ‘‘तुम दोनों मिल के गाओ तो एक अधन्ना दें। खूब जोर से !’’ भाई-बहन दोनों ने गाना शुरू किया-माल कताली मल जाना, पल

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Thursday, 5 November 2015

अरब देश की अजब कथाएँ


Arab Desh ki Ajab Kathaen 

हर देश की अपनी संस्कृति होती है| अरब देश हमेशा से ही बहुत आकर्षक रहा है क्योंकि वाहा का रहें सहन और वाहा की तहज़ीब यहा से अलग है| इसी वजह से वाहा की कहानियाँ भी बहुत अनोखी और पढ़ने में मज़ेदार होती है| रहस्य से पारी पूर्ण और लुभावनी ये कहानियाँ ज़रूर पढ़नी चाहिए

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Sunday, 1 November 2015

जिन खोजा तिन पाइया

प्रस्तुत हैं पुस्तक के कुछ अंश

प्रतिष्ठित लेखक अयोध्याप्रसाद गोयलीय के इस अप्रतिम कथा-संग्रह, ‘जिन खोजा तिन पाइयाँ’ को यदि हिन्दी का हितोपदेश कहें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। वहीं अनुभव, वहीं ज्ञान, वही विवेक है इसमें।


अनुभवी लेखक गोयलीय जी ने जीवन और जगत में जो देखा, सुना, पढ़ा और समझा, प्रस्तुत कृति में सरल सुबोध शैली में सँजोकर रख दिया हैं। इसमें जीवन-निर्माण एवं उत्साह, प्रेरणा और शक्ति प्रदान करने वाली 102 लघु-कथाएँ हैं। इनका स्वरूप लघु है पर ज्ञान-गुम्फन की दृष्टि से सागर जैसी प्रौढ़ता, विशालता तथा विस्तार है। इनमें बहुत-सी कहानियाँ मनुष्य के अन्तर की उस ऊँचाई को पाठक के सामने पेश करती हैं जो उसे सचमुच मनुष्य बनाती हैं। हिन्दी के सहृदय पाठक को समर्पित है भारतीय ज्ञानपीठ की एक सुन्दर कृति, नयी साज-सज्जा के साथ।


आमुख

गोयलीयजी-की क़लम ने अपनी जादूगरी से हिन्दी-पाठकों को मोह रखा है। ‘शेर-ओ-शायरी’ और ‘शेर-ओ-सुख़न’ उनकी ऐसी कृतियाँ हैं जो साहित्य में सदा स्मरणीय रहेंगी। दो वर्ष पूर्व जब उनकी पुस्तक ‘गहरे पानी पैठ’ प्रकाशित हुई तो साधारण पाठक और असाधारण आलोचक- सभी उसकी लोकप्रिय विषय-वस्तु और रोचक शैली से प्रभावित हुए। चुटीली कहानियाँ, अद्भुत घटनाएँ, मज़ेदार चुटकुले, दिलचस्प लतीफ़े, गहरे अनुभव, पढ़े-सुने क़िस्से- सभी कुछ इस ढंग से लिखे गये हैं कि पाठकों का ज्ञान, प्रेरणा और मनोरंजन एक जगह एक साथ मिल जाता है। 

गोयलीयजी की यह नयी कृति ‘जिन खोजा तिन पाइयाँ’ भी उतनी ही ज्ञानवर्द्धक, प्रेरक और रोचक है, जितनी ‘गहरे पानी पैठ’; बल्कि इसमें शैली का निखार कुछ अधिक ही है। इसे बालक तो चाव से पढ़ ही सकते हैं, युवकों को भी इससे प्रेरणा और दृष्टि मिलेगी। बुर्ज़ुर्गों को इसमें उनके अपने अनुभवों के प्रत्यावर्तन और प्रतिध्वनि की प्रतीति होगी। चूँकि ‘जिन खोजा तिन पाइयाँ’ में केवल वहीं है जो लेखक ने स्वयं देखा है, दूसरों से सुना है, पुस्तकों में पढ़ा है या बुद्धि से समझा है, इसलिए इसमें बहुत कुछ ऐसा होना चाहिए जो आपने भी देखा-सुना या पढ़ा-गुना हो। पर देखने-देखने में, सुनने-सुनने में और पढ़ने-पढ़ने में अन्तर है। अपने-अपने दृष्टिकोण से वस्तु को समझाने में तो अन्तर होना ही हुआ।

हम-आप भी रात-दिन में सफ़र करते हैं, पर हममें से कितने ऐसे हैं, जिन्हें सन्तोषी थानेदार, त्यागी भिखारी, विनयशील सन्यासी, पैसे को हाथ न लगाने वाला पानीपाँड़े और दो दिन भूखे रहकर भी कर्ज़ के पैसों को बिना बरते लौटानेवाला शानदार चपरासी सहयात्री के रूप में मिलते हैं। ऐसे व्यक्ति जो अभावों में रहकर मुस्कुराते हैं और दूसरों की अयाचित ‘कृपा’ को भी अपनी मुफ़लिसी की शान से ‘याचना-सा’ बना देते हैं- जिनको कुछ दे सकने में दाता अपने को उपकृत समझे ! यह बात नहीं कि गोयलीयजी को गिरहकट या उजलेपोश बदमाश नहीं मिलते-बहुत मिलते हैं। उनसे उचक्कों और गिरहकटों के क़िस्से सुनिए कि कैसे दिन-दहाड़े उनके देखते-देखते एक उचक्का यह कहकर बिस्तर-ट्रंक ले उड़ा कि ‘भाई साहब, गाड़ी आने में देर है; इज़ाजत दें तो बीवी-बच्चों को आपके ट्रंक-बिस्तरे पर बिठा दूँ।’ किस तरह एक ‘सज्जन’ बातों-बातों में अपना आगरे का पता बता चुकने के बाद पार्सल की रसीद भरने के लिए पार्कर पेन माँगकर सामने लिखते-लिखते चम्पत हो गये और उनकी दो रुपये की ख़ाली पेटी लिये-लिये गोयलीयजी क़ुली बने घूमते रहे पर किसी रेलवे अधिकारी ने टूटी ख़ाली पेटी को सँभालकर रखने की कृपा न दिखायी। इलाहाबाद के एक होटल में हम लोग ठहरे तो होटल के मैनेजर गोयलीयजी के ‘दोस्त’ बन गये। एक रोज़ शाम तक मैनेजर न लौटे तो बैरा ने शुबा डाल दिया कि कहीं मैनेजर किसी एक्सीडेंट की चपेट में न आ गये हों। अब गोयलीयजी जैसे कि तैसे उनकी तलाश में निकल पड़े। बहुत रात गये लौटने पर पता चला कि वास्तव में ‘एक्सीडेंट’ यह हुआ है कि गोयलयजी के पर्स, घड़ी और पेन मिलकर मैनेजर को भगा ले गये- क्योंकि पुलिस की ‘कोशिशों’ के बावजूद चारों में से किसी का पता न चला। दौड़-धूप में और पुलिस के चाय-पानी में सिर्फ़ पचास रुपये खर्च पड़े होंगे- सिर्फ़ पचास रुपये में ही ख़ूब मोटा फ़ाइल गोयलयजी की ख़ातिर पुलिस ने बना दिया था। आप मुस्कराएँगे और कहेंगे कि दो-चार क़िस्से तो इस तरह के हमारे साथ भी गुज़रे हैं। और सौ-पचास क़िस्से आपको अपने दोस्तों के भी याद आ जाएँगे। ....फिर आप चौंकेंगे और सोचेंगे कि दुनियाँ में घटनाएँ तो ज़्यादातर दूसरे ही प्रकार की घटती हैं, फिर गोयलयजी को इस तरह के थानेदार, भिक्षुक, पानीपाँड़े और चपरासी कहाँ से मिल जाते हैं, और कैसे मिल जाती है थर्ड क्लास में फूल-सी नाज़नी जो माथे पर हाथ रखकर सोयी हुई होती है तो उपमा सूझती है :


दमे-ख़ाब है दस्ते-नाज़ुक जबीं पर

किरन चाँद की गोद में सो रही है

डाउनलोड करें- जिन खोजा तिन पाइया

Saturday, 24 October 2015

मानसरोवर भाग 3 - प्रेमचंद

Mansarovar 3 by Premchand

यह प्रेमचंद द्वारा लिखी गई कहानियों का संकलन है। उनके निधनोपरांत मानसरोवर नाम से ८ खण्डों में प्रकाशित इस संकलन में उनकी दो सौ से भी अधिक कहानियाँ शामिल है। किया गया है। 

डाउनलोड करें- मानसरोवर भाग 3

Saturday, 17 October 2015

शेखचिल्ली की कहानियां (Shekhchilli)


शेखचिल्ली को भला कौन नहीं जानता। अरे वही शेखचिल्ली जो सपने में ही ताजमहल खड़ा कर देता था। हममे से हर कोई कभी न कभी शेखचिल्ली जरूर बना होगा। शेखचिल्ली की मनोरंजक कहानियों का संग्रह।


डाऊनलोड करें- शेखचिल्ली की कहानियां

Thursday, 15 October 2015

पांच गधे (5 Gadhe)- रांगेय राघव



पांच गधे रांगेय राघव की चुनिंदा कहानियों का संकलन है।

डाऊनलोड करें- पांच गधे

Wednesday, 14 October 2015

Saturday, 10 October 2015

Sunday, 27 September 2015

Vishwa ki Prasiddh Aatank Kathayen (विश्व की प्रसिद्ध आतंक कथाएं)

संसार की प्राचीन कहानियां- रांगेय राघव




विश्व की प्राचीनतम कहानियों का संग्रह (sansar ki prachin kahaniya)

डाऊनलोड करें- संसार की प्राचीन कहानियां

प्रेम पूर्णिमा- प्रेमचंद




मुन्शी प्रेमचन्द एक व्यक्ति तो थे ही, एक समाज भी थे, एक देश भी थे व्यक्ति समाज और देश तीनों उनके हृदय में थे। उन्होंने बड़ी गहराई के साथ तीनों की समस्याओं का माध्यम किया था। प्रेमचन्द हर व्यक्ति की, पूरे समाज की और देश की समस्याओं को सुलझाना चाहते थे, पर हिंसा से नहीं, विद्रोह से नहीं, अशक्ति से नहीं और अनेकता से भी नहीं। वे समस्या को सुलझाना चाहते थे प्रेम से, अहिंसा से, शान्ति से, सौहार्द से, एकता से और बन्धुता से। प्रेमचन्द आदर्श का झण्डा हाथ में लेकर प्रेम एकता, बन्धुता, सौहार्द और अहिंसा के प्रचार में जीवन पर्यन्त लगे रहे। उनकी रचनाओं में उनकी ये ही विशेषतायें है।


डाऊनलोड करें- प्रेम पूणिमा

Thursday, 24 September 2015

Dastan-e-Mulla Nasiruddin

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वह अमीरों के लिए सिरदर्द था। वह हमदर्द था भूखे-नंगे और व्यवस्था से दुखी लोगों का। वह सारे काम अपने तरीके से करता था-बिना किसी स्वार्थ के। वह मसखरा नहीं, एक फक्कड़ और नेकदिल इन्सान था। उसकी नजर में दुनिया भर में अगर कोई सबसे पाक था, तो वह था बुखारा-उसकी मातृभूमि।

दास्तान-ए-मुल्ला नसरुद्दीन

मुल्ला नसरुद्दीन का नाम जुबां पर आते ही हमारे दिल-दिमाग में एक मुस्कराता सा चेहरा उभर आता है। ज्यादातर लोग यही समझते हैं कि वह गुजरे जमाने का कोई मसखरा नहीं बल्कि एक फक्कड़ शख्स था, जो बुखारा की उस समय की अन्यायपूर्ण व्यवस्था का सबसे प्रबल विरोधी था।
वह सिरदर्द था अमीरों का क्योंकि वह अन्याय के खिलाफ लोगों में जागृति पैदा कर रहा था। वह दुश्मन था सूदखोरों का, जो जोंक की भांति गरीब रिआया का खून चूस रहे थे।
वह निःस्वार्थ परोपकारी था। अमीरों, सूदखोरों और भ्रष्ट राजदरबारियों को कंगाल करके वह उस दौलत को गरीबों में बांट दिया करता था।

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