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Tuesday, 21 June 2016

अज्ञातवास (श्रीलाल शुक्ल)


Agyatwas by Srilal Shukl

परस्तुत उपन्यास हमारे ब्लॉग के एक पाठक श्री हिमांशु जी द्वारा उपलब्ध कराई गई है। उन्हें कोटिशः धन्यवाद्।


श्रीलाल शुक्ल जी की लेखनी द्वारा शहर और गाँवों, दोनों के जीवन का अत्यंत सहज वर्णन

प्रस्तुत है पुस्तक के कुछ अंश

गाँव और शहर दोनों की कहानियाँ और एक साथ कहने में श्रीलाल शुक्ल माहिर है। और बहुत कम पृष्ठों में कहानी के भीतर कहानी इस तरह पिरोते चले जाते हैं कि पूरा पढ़े बिना पाठक चैन नहीं लेता। अज्ञातवास एक ऐसी ही अफसर श्रेणी के इंजीनियर की कहानी है जिसकी स्मृतियां एक चित्र को देखकर जाग उठती हैं और जो अपने स्वयं के मित्रों के जिस गांव में उसका डेरा है वहाँ के निवासियों के और अपनी बेटी के भी जीवन की घटनाओं को पर्त-दर-पर्त सामने रखती चली जाती हैं। उसकी पत्नी और उपपत्नी की कथा उपन्यास का चरम बिन्दु है जो बिलकुल अंत में जाकर स्पष्ट होता है। अज्ञातवास निश्चित रूप से एक श्रेष्ठ,पठनीय उपन्यास है।

प्रस्तावना

‘अज्ञातवास’ 1956-60 में लिखा गया था। यदि 1961 में श्री स.ही. वात्स्यायन की मुझे सहज कृपा न मिली होती और राजपाल एण्ड सन्ज़ एक अपेक्षाकृत नये लेखक के लिए कुछ ख़तरा-उठाने के लिए तैयार न हुए होते, तो शायद इसका उस वर्ष भी छपना मुश्किल होता।

उन दिनों पत्र-पत्रिकाओं में निकलनेवाली इसकी समीक्षाओं से मैं उतना ही प्रोत्साहित हुआ था जितना इसकी धीमी बिक्री से प्रकाशकों को निरुत्साहित होना चाहिए था। पर निश्चय ही उनका उत्साह संदेह से परे है। वे इस उपन्यास का अब नया संस्करण निकाल रहे हैं। मैं आभारी हूं।


इस संस्करण में-एक अपवाद छोड़कर-मूल पुस्तक को यथावत् रहने दिया गया है। अपवाद मूल पुस्तक के अंग्रेज़ी अनुच्छेदों के विषय में है। अपने आरम्भिक रचनाकाल में भाषा के, और विशेषतया कथा-साहित्य में पात्रों के वार्तालाप की भाषा के बारे में मैं उतना सचेत न था। इससे अज्ञातवास के कुछ स्थलों में अंग्रेज़ी का बेहिचक प्रयोग हुआ था। इस संस्करण में मैंने अंग्रेज़ी के अधिकांश अनुच्छेदों को हिन्दी में रूपान्तरित कर दिया है। पर कहीं-कहीं अंग्रेज़ी के वाक्य और टुकड़े पूर्ववत् मौजूद हैं। अपने हिन्दी लेखन में अंग्रेजी का स्वच्छन्द प्रयोग करने वाले कई रचनाकारों की तरह किसी समय मैं भी रचना-प्रक्रिया की गहनता से जूझे बिना, दिमाग पर ज़रा-सा दबाव पड़ते ही, किस तरह अंग्रेज़ी की ओर लपकता था, इसका आभास अब भी इस पुस्तक से मिल जाएगा।

समर्पण

इस उपन्यास में रजनीकांत गाँव के होकर भी वहां की आंतरिकता से अपरिचित रहे। कच्ची झोपड़ियां और पक्के बंगले, तुलसी ओर क्रोटन इनके अन्तर की तुच्छता में ही वे उलझे रहे। इनसे ऊपर उठकर जीवन के बृहत्तर परिवेश में वे अपने को नहीं पहचान सके।

ठीक इसके विपरीत श्रीमती गिरिजा शुक्ल के साथ हुआ। उन्होंने पहले कभी गांव न देखा था। शादी होने के बाद ही वे पहली बार एक गांव में आईं। तब बरसात शुरू हो गई थी और ग्राम्यगीतों और सौम्य कविताओं के सम्मिलित षड़्यंत्र के बावजूद रास्तों और मकानों में सीलन, कीचड़, मच्छर, मलेरिया और सांप-बिच्छू का ही आकर्षण था। पर कीचड़ से लथपथ और मलेरिया से जर्जर गाँव की संक्रामक आत्मा ने उन्हें अपनी ओर खींचा और दोनों ने एक-दूसरे को अपना लिया।

जीवन के प्रति एक शांत, सम्यक् दृष्टि का परिचय देते हुए बाहरी वातावरण से ऊपर उठकर उन्होंने वहाँ की मानवीय स्थिति को आत्मसात् करने की कोशिश की। इस प्रकार उन्होंने यथार्थ के सहज और आंतरिक सौंदर्यका वरण किया।

पति होकर भी आज तक मैं उनकी इस प्रवृत्ति को छोटा बनाकर नहीं देख पाया।

विवाहित जीवन के उन प्रारम्भिक दिनों का स्मरण करते हुए अपनी यह कृति उन्हें ही अर्पित करता हूं।

श्रीलाल शुक्ल

चित्र की ओर कुछ देर बराबर देखते रहने के बाद रजनीकान्त ने पूछा, और इसका नाम क्या है ?’’ राजेश्वर सरलता से हंसा; बोला, नाम के ही मामले में मैं कमज़ोर पड़ता हूं। मेरे मन में कुछ बिम्ब उभरते हैं, उन्हीं के सहारे चित्र बनता जाता है। चित्र बन जाता है, पर मैं नाम नहीं खोज पाता। नाम ढूँढ़ने के लिए चित्रकार नहीं, कवि होना पड़ता है।’’

उन्होंने कहा, ‘‘क्या हर्ज है, थोड़ देर के लिए कवि ही सही....’’ राजेश्वर फिर वैसे ही हंसा। कहने लगा, ‘‘मैं कवि नहीं हो सकता, मेरे शब्द कमज़ोर हैं। तभी तो रंगों और रेखाओं का सहारा लिया है।’’

रजनीकान्त के मन में आया, कुछ देर उससे शब्दों की कविता और रेखाओं की कविता की अभिन्नता पर बहस की जाय। पर उन्होंने अपनी इस इच्छा को दबा लिया।


हर साल इंजीनियरिंग कॉलिज से निकले हुए कुछ तेज़ विद्यार्थी उनकी मातहती में इन्जीनियर होकर आते हैं। उस समय माहवारी तनख्वाह पानेवालों की उनमें परम्परागत विनम्रता नहीं होती। हर बात में वे अपनी राय देते हैं, हर बात पर बहस कर सकते हैं। उनको चुप करने के लिए रजनीकान्त ने एक गम्भीर मुस्कराहट का आविष्कार किया है, जिसके सहारे वे बिना कुछ कहे ही बहुत से तर्कों का जवाब दे देते हैं। इस समय उसी मुस्कराह

डाऊनलोड करें- अज्ञातवास

Sunday, 19 June 2016

हैरी पॉटर और आग का प्याला




Harry Potter aur Aag ka Pyala

उपन्यास की इस चौथी कड़ी में हैरी को हॉग्वार्ट्स में ज़बरन तीन-जादूगर प्रतियोगिता में भाग लेना पड़ता है जिसके तीन चरण हैं और जिसमें तीन जादू-विद्यालय भाग लेते हैं। पहले चरण में हैरी ड्रैगन से लड़ता है, दूसरे चरण में झील के पानी के नीचे संघर्ष करता है और तीसरे चरण में उसे भूल-भुलैया में से ट्रॉफ़ी लेनी होती है। उलटे वो और उसका सह-प्रतिद्वन्दी (सॅड्रिक डिगरी) ट्रॉफ़ी छूते ही लॉर्ड वोल्डेमॉर्ट के पास पहुँच जाते हैं, जहाँ वर्मटेल सॅड्रिक का कत्ल कर देता है और हैरी के ख़ून की मदद से वो लॉर्ड वोल्डेमॉर्ट को जिस्मो-जान समेत ज़िन्दा कर देता है। मगर हैरी वोल्डेमॉर्ट की पकड़ से इस बार भी भाग निकलता है। वोल्डेमॉर्ट के वापिस ज़िन्दा हो कर आने की बात को ब्रिटेन का जादूमन्त्री कॉर्नेलियस फ़ज झूठ करार देता है।

डाउनलोड करें- आग का प्याला

Sunday, 6 December 2015

वयं रक्षामः (आचार्य चतुरसेन)


Vayam Rakshamah (Acharya Chatursen)

 ‘वैशाली की नगरवधू’ लिखकर मैंने हिन्दी उपन्यासों के संबंध में एक नया मोड़ उपस्थित किया था कि अब हमारे उपन्यास केवल मनोरंजन तथा चरित्र-चित्रण-भर की सामग्री नहीं रह जाएँगे। अब यह मेरा उपन्यास है ‘वयं रक्षाम:’ इस दशा में अगला कदम है।

इस उपन्यास में प्राग्वेदकालीन नर, नाग, देव, दैत्य-दानव, आर्य-अनार्य आदि विविध नृवंशों के जीवन के वे विस्तृत-पुरातन रेखाचित्र हैं, जिन्हें धर्म के रंगीन शीशे में देख कर सारे संसार ने अंतरिक्ष का देवता मान लिया था। मैं इस उपन्यास में उन्हें नर रूप में आपके समक्ष उपस्थित करने का साहस कर रहा हूँ। आज तक कभी मनुष्य की वाणी से न सुनी गई बातें, मैं आपको सुनाने पर आमादा हूँ।....उपन्यास में मेरे अपने जीवन-भर के अध्ययन का सार है।...

-आचार्य चतुरसेन

सकलकलोद्वासित-पक्षद्वय-सकलोपधा-विशुद्ध-मखशतपूत-प्रसन्नमूर्ति-स्थिरोन्नत-होमकरोज्ज्वल-

ज्योतिज्र्योतिर्मुख-स्वाधीनोदारसार-स्थगितनृपराजन्य-शतशतपरिलुण्ठन मौलिमाणिक्यरोचिचरण-प्रियवाचा-मायतन-साधुचरितनिकेतन-लोकाश्रयमार्गतरु-भारत-गणपतिभौमब्रह्ममहाराजाभिध-

श्रीराजेन्द्रप्रसादाय ह्यजातशत्रवे अद्य गणतन्त्राख्ये पुण्याहे भौमे माघमासे सिते दले तृतीयायां वैक्रमीये तलाधरेश्वरशून्यनेत्राब्दे निवेदयामि साञ्जलि:स्वीयं साहित्य-कृति वयं ‘रक्षाम:’ इति सामोदमहं चतुरसेन:।

मेरे हृदय और मस्तिष्क में भावों और विचारों की जो आधी शताब्दी की अर्जित प्रज्ञा-पूंजी थी, उन सबको मैंने ‘वयं रक्षाम:’ में झोंक दिया है। अब मेरे पास कुछ नहीं है। लुटा-पिटा-सा, ठगा-सा श्रान्त-कलान्त बैठा हूं। चाहती हूं-अब विश्राम मिले। चिर न सही, अचिर ही। परन्तु यह हवा में उड़ने का युग है। मेरे पिताश्री ने बैलगाड़ी में जीवन-यात्रा की थी, मेरा शैशव इक्का-टांगा-घोड़ों पर लुढ़कता तथा यौवन मोटर पर दौड़ता रहा। अब मोटर और वायुयान को अतिक्रान्त कर आठ सहस्त्र मील प्रति घंटा की चाल वाले राकेट पर पृथ्वी से पांच सौ मील की ऊंचाई पर मेरा वार्धक्य उड़ा चला जा रहा है। विश्राम मिले तो कैसे ? इस युग का तो विश्राम से आचू़ड़ वैर है। बहुत घोड़ो को, गधों को, बैलों को बोझा ढोते-ढोते बीच राह मरते देखा है। इस साहित्यकार के ज्ञानयज्ञ की पूर्णाहुति भी किसी दिन कहीं ऐसे ही हो जाएगी। तभी उसे अपने तप का सम्पूर्ण पुण्य मिलेगा। 

गत ग्यारह महीनों में दो-तीन घण्टों में अधिक नहीं सो पाया। सम्भवत: नेत्र भी इस ग्रन्थ की भेंट हो चुके हैं। शरीर मुर्झा गया है, पर हृदय आनन्द के रस में सराबोर है। यह अभी मेरा पैसठवां ही तो बसन्त है। फिर रावण जगदीश्वर मर गया तो क्या ? उसका यौवन, तेज, दर्प, दुस्साहस, भोग और ऐश्वर्य, जो मैं निरन्तर इन ग्यारह मासों में रात-दिन देखता हूं, उसके प्रभाव से कुछ-कुछ शीतल होते हुए रक्तबिन्दु अभी भी नृत्य कर उठते हैं। गर्म राख की भांति अभी भी उनमें गर्मी है। आग न सही, गर्म राख तो है।

डाउनलोड करें- वयं रक्षामः (पूर्वार्ध)

डाउनलोड करें- वयं रक्षामः (उत्तरार्ध)

Tuesday, 1 December 2015

Sunday, 29 November 2015

निर्बंध (महासमर भाग 8)- नरेंद्र कोहली

Nirbandh (Mahasamar 8) by Narendra Kohli

महासमर सीरीज़ का आखिरी उपन्यास

पाठक पूछता है कि यदि उसे महाभारत की कथा पढ़नी है तो वह व्यासकृत मूल महाभारत ही क्यों न पढ़े, नरेन्द्र कोहली का उपन्यास क्यों पढ़े ? वह यह भी पूछता है कि उसे उपन्यास ही पढ़ना है, तो वह समसामयिक सामाजिक उपन्यास क्यों न पढ़े, नरेन्द्र कोहली का ‘महासागर’ ही क्यों पढे़ ? 

‘महासागर’ हमारा काव्य भी है, इतिहास भी और अध्यात्म भी। हमारे प्राचीन ग्रंथ शाश्वत सत्य की चर्चा करते हैं। वे किसी कालखंड के सीमित सत्य में आबद्ध नहीं हैं, जैसा कि यूरोपीय अथवा यूरोपीयकृत मस्तिष्क अपने अज्ञान अथवा बाहरी प्रभाव में मान बैठा है। नरेंन्द्र कोहली ने न महाभारत को नए संदर्भो में लिखा है, न उसमें संशोधन करने का कोई दावा है। न वे पाठको को महाभारत समझाने के लिए, उसकी व्याख्या कर रहे हैं। नरेन्द्र कोहली यह नहीं मानते कि महाकाल की यात्रा, खंडों में विभाजित है, इसलिए जो घटनाए घटित हो चुकी हैं, उनमें अब हमारा कोई संबन्ध नहीं है, उनकी मान्यता है कि न तो प्रकृति के नियम बदले हैं, न मनुष्य का मनोविज्ञान। मनुष्य की अखंड कालयात्रा को इतिहास खंड़ों में बाँटे तो बाँटे, साहित्य उन्हें विभाजित नहीं करता, यद्यपि ऊपरी आवरण सदा ही बदलते रहते हैं। 

महाभारत की कथा भारतीय चिंतन और भारतीय संस्कृति की अमूल्य थाती है। नरेन्द्र कोहली ने उसे ही अपने उपन्यास का आधार बनाया है, जो उसे अपने बाहरी कथा मनुष्य के उस अनवरत युद्ध की कथा है, जो उसे अपने बाहरी भीतरी शत्रुओं के साथ निरंतर करना पड़ता है। वह उस संसार में रहता है, जिसमें चारों ओर लोभ, मोह, सत्ता और स्वार्थ संघर्षरत हैं। बाहर से अधिक, उसे अपनों से लड़ना पड़ता है। और यदि वह अपने धर्म पर टिका रहता है, तो वह इसी देह में स्वर्ग भी जा सकता है- इसका आश्वासन ‘महाभरत’ देता है। लोभ, त्रास और स्वार्थ के विरुद्ध मनुष्य के इस सात्विक उपन्यास के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।..और वह है ‘महासागर’। आठ खंडो में प्रकाशित होने वाले इस उपन्यास का यह आठवा और अंतिम खंड है। इस खंड के साथ यह उपन्यास श्रंखला पूर्ण हुई, जिसके लेखन में लेखक को पंद्रह वर्ष लगे हैं। कदाचित् यह हिंदी की सबसे बृहदाकार उपन्यास है, जो रोचकता, पठनीयता और इस देश की परंपरा के गंभीर चिंतन को एक साथ समेटे हुए है। 

आप इसे पढ़े और स्वयं अपने आप से पूछें, आपने इतिहास पढ़ा ? पुराण पढ़ा ? धर्मग्रंथ पढ़ा अथवा एक रोचक उपन्यास पढ़ा ? इसे पढ़कर आपका मनोरंजन हुआ है ? आपका ज्ञान बढ़ा ? आपका अनुभूति-संसार समृद्ध हुआ ? अथवा आपका विकास हुआ ? क्या आपने इससे पहले कभी ऐसा कुछ पढ़ा था ?


डाउनलोड करें- निर्बंध

हैरी पॉटर और अज़्काबान का कैदी

Harry Potter aur Azkaban ka Kaidi

हैरी पॉटर सीरीज़ की तीसरी पुस्तक
हैरी पॉटर अपने दोस्तों रॉन और हर्माइनी के साथ हॉगवर्ट्स जादू और तंत्र के विद्यालय में थर्ड ईयर की पढ़ाई शुरू करने वाला है। गर्मी की छुट्टियों के बाद हैरी स्कूल जाने के लिए बेताब है। इसमें कोई अजीब बात नहीं है, क्योंकि उसे डर्स्ली परिवार में रहना बहुत भयानक लगता है। लेकिन जब हैरी हॉगवर्ट्स पहुँचता है, तो उसे वहाँ भी तनावपूर्ण माहौल ही मिलता है। हर तरफ दहशत फैली है...तेरह लोगों की सामूहिक हत्या करने वाला खूनी अज़्काबान जेल से भाग, निकला है और उसके इरादे खूँखार हैं। अब उस खूनी का अगला निशाना हॉगवर्ट्स ही है, जहाँ हैरी पढ़ता है। यही वजह है कि हॉगवर्ट्स स्कूल की रखवाली के लिए दमपिशाचों यानी अज्काबान के खतरनाक पहरेदारों को बुलाया गया है....क्या उसका निशाना हैरी पॉटर है?...क्या वह खूनी अपने इरादों में कामयाब हो पाएगा

हैरी और उसके दोस्तों की मंत्रमुग्ध करने वाली नई कहानी, जिसे जे. के. रोलिंग ने अपने चिर-परिचित मनमोहक अंदाज़ में लिखा है।

डाउनलोड करें- अज़्काबान का कैदी

Tuesday, 17 November 2015

प्रत्यक्ष (महासमर भाग 7)- नरेंद्र कोहली


Pratyaksh (Mahasamar 7) by Narendra Kohli 

नरेन्द्र कोहली के महाभारत की कथा पर आश्रित उपन्यास ‘महासमर’ का यह सातवाँ खंड है, जिसमें युद्ध के उद्योग और फिर युद्ध के प्रथम चरण अर्थात भीष्म पर्व की कथा है। कथा तो यही है कि पांडवों ने अपने सारे मित्रों से सहायता माँगी। कृष्ण से भी। पर नरेन्द्र कोहली का प्रश्न है कि जो कृष्ण जो आज तक युधिष्ठिर से कह रहे थे कि वे कुछ न करें बस अनुमति दे दें तो यादव ही दुर्योंधन का वध कर पांडवों का राज्य उन्हें प्राप्त करवा देंगे, वे कृष्ण उद्योग की भूमि उपलव्य से उठकर द्वारका क्यों चले गए ? पांडवों को उनसे सहायता माँगने के लिए द्वारका क्यों जाना पड़ा ? कृष्ण ने पापी दुर्योधन को अपने परम मित्र अर्जुन के समकक्ष कैसे मान लिया ? प्रश्न यह भी है कि जो कृतवर्मा, कृष्ण का समधी था, जिसने कौरवों की राज सभा से कृष्ण को सुरक्षित बाहर निकाल लाने के लिए अपनी जान लड़ा दी, वह दुर्योधन के पक्ष से युद्ध करने क्यों चला गया ? ऐसा क्या हो गया कि यादवों के सर्वप्रिय नेता कृष्ण जब पांडवों की ओर से युद्ध में सम्मलित होने आए तो उनके साथ न उनके भाई थे, न पुत्र ? कोई नहीं था कृष्ण के साथ। यादवों में इतने अकेले कैसे हो गए कृष्ण ?

जिस युधिष्ठिर के राज्य के लिए यह युद्ध होना था, वह युधिष्ठिर ही युद्ध के पक्ष में नहीं था। जिस अर्जुन के बल पर पांडवों को यह युद्ध लड़ना था, वह अर्जुन अपना गांडीव त्याग हताश होकर बैठ गया था। उसे युद्ध नहीं करना था। जिन यादवों का सबसे बड़ा सहारा था, उन यादवों में से कोई नहीं आया लड़ने, तो महाभारत का युद्ध कौन लड़ रहा था ? कृष्ण ? अकेले कृष्ण ? जिन के हाथ में अपना कोई शस्त्र भी नहीं था ? 

अर्जुन शिखंडी को समाने रख भीष्म का वध करता है अथवा पहले चरण में वह भीष्म को शिखंडी से बचाता रहा है और फिर अपने जीवन और युग से हताश भीष्म को एक क्षत्रीय की गौरवपूर्ण मृत्यु देने के लिए उनसे सहयोग करता है ? कर्ण का रोष क्या था और क्या था कर्ण का धर्म ? कर्ण का चरित्र ? इस खंड में कुंती और कर्ण का प्रत्यक्ष साक्षात्कार हुआ हा। और कुंती ने प्रत्यक्ष किया है कर्ण की महानता को। बताया है उसे कि वह क्या कर रहा है, क्या करता रहा है। बहुत कुछ प्रत्यक्ष हुआ है, महासमर के इस सातवें खंड प्रत्यक्ष में।....किंतु सब से अधिक प्रत्यक्ष हुए हैं नायकों के नायक श्रीकृष्ण। लगता है कि एक बार कृष्ण प्रकट हो जाएँ तो अन्य प्रत्येक पात्र उनके सम्मुख वामन हो जाता है। और इसी खंड में है कृष्ण की गीता...भगवद्गीता..। एक उपन्यास में गीता, जो गीता भी है और उपन्यास भी। इस खंड को पढ़ने के पश्चात निश्चित रूप से आप अनुभव करेंगे कि आप कृष्ण को बहुत जानते थे, पर फिर भी इतना तो नहीं ही जानते थे।..

डाउनलोड करें- प्रत्यक्ष

Wednesday, 11 November 2015

आखरी मकसद- सुरेन्द्र मोहन पाठक

Akhri Maqsad by Surendra Mogan Pathak 

कहते हैं दुनिया में हर किसी का कहीं न कहीं कोई न कोई डबल होता है ! सुधीर कोहली की बदकिस्मती थी कि उसका डबल दिल्ली में ही निकल आया था ! और अब उन दोनों में से एक का मरना लाजिमी था !

डाउनलोड करें- आखरी मकसद

पृच्छन्न (महासमर भाग 6) - नरेंद्र कोहली


Prichhann (Mahasamar 6) by Narendra Kohli 

महाकाल असंख्य वर्षों की यात्रा कर चुका है, किन्तु न मानव की प्रकृति परिवर्तित हुई है, न प्रकृति के नियम। उसका ऊपरी आवरण कितना भी भिन्न क्यों न दिखाई देता हो, मनुष्य का मनोविज्ञान आज भी वही है, जो सहस्त्रों वर्ष पूर्व था।

बाह्य संसार के सारे घटनात्मक संघर्ष वस्तुतः मन के सूक्ष्म विकारों के स्थूल रूपांतरण मात्र हैं। अपनी मर्यादा का अतिक्रमण कर जाए, तो ये मनोविकार, मानसिक विकृतियों में परणीत हो जाते हैं। दुर्योधन इसी प्रक्रिया का शिकार हुआ है। अपनी आवश्यकता भर पाकर वह संतुष्ट नहीं हुआ। दूसरों का सर्वस्व छीनकर भी वह शांत नहीं हुआ। पांडवों की पीड़ा उसके सुख की अनिवार्य शर्त थी। इसलिए वंचित पांडवों को पीड़ित और अपमानित कर सुख प्राप्त करने की योजना बनाई गई। घायल पक्षी को तड़पाकर बच्चों को क्रीड़ा का-सा-आनन्द आता है। मिहिर कुल को अपने युद्धक गजों को पर्वत से खाई में गिरकर उनके पीड़ित चीत्कारों को सुनकर असाधारण सुख मिला था। अरब शेखों को ऊँटों की दौड़ में, उनकी पीठ पर बैठे बच्चों की अस्थियों और पीड़ा से चिल्लाने को देख-सुनकर सुख मिलता है। महासमर-6 में मनुष्य का मन अपने ऐसे ही प्रच्छन्न भाव उद्घाटित कर रहा है।


दुर्वासा ने बहुत तपस्या की है, किंतु न अपना अहंकार जीता है न क्रोध। एक अहंकारी और परपीड़क व्यक्तित्व, प्रच्छन्न रूप से उस तापस के भीतर विद्यमान है। वह किसी के द्वार पर आता है, तो धर्म देने के लिए नहीं। वह तमोगुणी तथा रजोगुणी लोगों को वरदान देने के लिए और सतोगुणी लोगों को वंचित करने के लिए आता है। पर पांडव पहचानते हैं कि संन्यासियों का समूह, जो उनके द्वार पर आया है सात्विक संन्यासियों का समूह नहीं है। यह एक प्रच्छन्न टिड्डी दल है जो उनके अन्न भण्डार को समाप्त करने आया है। ताकि जो पांडव दुर्योधन के शस्त्रों से न मारे जा सके, वे अपनी भूख से मर जाएँ।


दुर्योधन के सुख में प्रच्छन्न रूप से बैठा है, दुख और युधिष्ठिर की अव्यावहारिकता में प्रच्छन्न रूप से बैठा है धर्म। यह माया की सृष्टि है जो प्रकट रूप में दिखाई देता है, वह वस्तुतः होता नहीं, और जो वर्तमान है वह कहीं दिखाई नहीं देता।

पांडवों का आज्ञातवास, महाभारत-कथा का एक बहुत आकर्षक स्थल है। दुर्योधन की ग्रध्र दृष्टि से पांडव कैसे छिपे रह सके ? अपने आज्ञातवास के लिए पांडवों ने विराटनगर को ही क्यों चुना ? पांडवों के शत्रुओं में प्रच्छन्न मित्र कहां थे और मित्रों में प्रच्छन्न शत्रु कहाँ पनप रहे थे ?...ऐसे ही अनेक प्रश्नों को समेटकर आगे बढ़ती है, महासमर के इस छठे खंड ‘प्रच्छन्न की कथा। पाठक पूछता है कि यदि उसे महाभारत की ही कथा पढ़नी है तो वह व्यास कृत मूल महाभारत ही क्यों न पढ़े, नरेन्द्र कोहली का उपन्यास क्यों पढ़े ? वह यह भी पूछता है कि उसे उपन्यास ही पढ़ना है तो वह समसामायिक उपन्यास क्यों न पढ़े, नरेन्द्र कोहली का ‘महासमर’ ही क्यों पढ़े ??


‘महाभारत’ हमारा काव्य भी है, इतिहास भी और आध्यात्म भी। हमारे प्राचीन ग्रंथ शाश्वत सत्य की चर्चा करते हैं। वे किसी कालखंड के सीमित सत्य में आबद्ध नहीं हैं, जैसा कि यूरोपीय अथवा यूरोपीयकृत मस्तिष्क अपने अज्ञान अथवा बाहरी प्रभाव को मान बैठा है। नरेन्द्र कोहली ने न महाभारत को नए संदर्भों में लिखा है, न उसमें संशोधन करने का कोई दावा है। न वे पाठक को महाभारत समझाने के लिए उसकी व्याख्या मात्र कर रहे हैं। वे यह नहीं मानते कि महाकाल की यात्रा खंडों में विभाजित है, इसलिए जो घटनाएँ घटित हो चुकीं, उनसे अब हमारा कोई संबंध नहीं है। न तो प्रकृति के नियम बदले हैं, न मनुष्य का मनोविज्ञान। मनुष्य की अखंड कालयात्रा को इतिहास खंडों में बाँटे तो बाँटे, साहित्य उन्हें विभाजित नहीं करता, यद्यपि ऊपरी आवरण सदा ही बदलते रहते हैं।


महाभारत की कथा भारतीय चिंतन और भारतीय संस्कृति की अमूल्य थाती है। नरेन्द्र कोहली ने उसे ही अपने उपन्यास का आधार बनाया है। महासमर की कथा मनुष्य के उस अनवरत युद्ध की कथा है, जो उसे अपने बाहरी और भीतरी शत्रुओं के साथ निरंतर करना पड़ता है। वह उस संसार में रहता है, जिसमें चारों ओर लाभ और स्वार्थ की शक्तियाँ संघर्षरत हैं। बाहर से अधिक उसे अपने भीतर लड़ना पड़ता है। परायों से अधिक उसे अपनों से लड़ना पड़ता है। और वह अपने धर्म पर टिका रहता है तो वह इसी देह में स्वर्ग जा सकता है। इसका आश्वासन ‘महाभारत’ देता है। लोभ, त्रास और स्वार्थ के विरूद्ध धर्म के इस सात्विक युद्ध को नरेन्द्र कोहली एक आधुनिक और मौलिक उपन्यास के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।... और वह है ‘महासमर’। ‘प्रच्छन्न’ महासमर का छठा खंड है। आप इसे पढ़ें और स्वयं अपने आप से पूछें, आपने इतिहास पढ़ा ? पुराण पढ़ा ? धर्मग्रंथ पढ़ा अथवा एक रोचक उपन्यास ? इसे पढ़कर आपका मनोरंजन हुआ ? आपका ज्ञान बढ़ा ?अथवा आपका विकास हुआ ? क्या आपने इससे पहले कभी ऐसा कुछ पढ़ा था ?

डाउनलोड करें- पृच्छन्न

Sunday, 8 November 2015

बबूसा - अनिल मोहन

Babusa (Anil Mohan) बबूसा सीरीज़ का पहला उपन्यास 

हमारी पृथ्वी पर अभी भी ऐसा बहुत कुछ है, जिसकी हम कल्पना भी नहीं करते! हम दूसरे ग्रहों को तो खोज रहे हैं परंतु पृथ्वी से अंजान हैं अभी! इसी पृथ्वी की एक जाति की चमत्कारी दास्तान है ये, जिसका वास्ता, कहीं दूर दुसरी दुनिया के एक ग्रह से है! ये दास्तान देवराज चौहान से ही सैकड़ों बरसों पहले शुरू हुई थी और अब उसका रुख फिर देवराज चौहान की तरफ मुड चुका है!

डाउनलोड करें- बबूसा

Wednesday, 4 November 2015

डायन (वेदप्रकाश शर्मा)

Dayan by Ved Prakash Sharma
डायन ...एक औरत के पति की मृत्यु हो गई। उसकी बुद्धि भ्रष्ट हुई तो पति को जिंदा करने के लिए दूसरों के बच्चांे की बलि देने लगी। पर उसे मालूम नहीं था कि किसी की आंखें सपनों में उसकी करतूतें देख रही हैं। फिर सपने देखने वाले और उस औरत के बीच जंग शुरु हुई, मगर वे तो सिर्फ बहाना थे, असली जंग तो माता दुर्गा और डायन के बीच थी और जब मां जगदम्बा अपने रौद्र रूप में आईं तो काली शक्तियों के चेहरे सफेद पड़ गए।

डायन-२ में एक ऐसे माँ की कहानी लेकर आया है
जिसके पास शरीर नहीं था । जो भावनाओं के भवर में बह रही थी और जिसे पारलौकिक दुनिया
की दुष्टात्माओं से टकराना था ।


डाउनलोड करें- डायन भाग 1

डाउनलोड करें- डायन भाग 2

Monday, 2 November 2015

बीवी का नशा (वेद प्रकाश शर्मा)


विभा जिंदल सीरीज़ 

Biwi ka Nasha (Ved Prakash Sharma) 

लोग कहते थे की वह अपनी बीवी के नशे में रहता है । सच था भी यही । बीवी को एक नेकलेस से नवाजने के लिए उसने एक हत्या कर दी और उस हत्या के जुर्म में उसकी बीवी ही पकड़ी गई । अब वह साबित करना चाहता था कि हत्या उसकी बीवी ने नहीं बल्कि उसी ने की है मगर यह बात वह साबित नहीं कर पा रहा था ।

डाउनलोड करें- बीवी का नशा

दूर की कौड़ी (वेद प्रकाश शर्मा)


Door Ki Kaudi (Ved Prakash Sharma)

ऐसा चालबाज़ शख्स, जो दूसरों से अपने मन माफिक चालें चलवाता था,

जबकि वे समझते थे कि ऐसा वे अपनी मर्ज़ी से कर रहे है ।

डाउनलोड करें- दूर की कौड़ी

Sunday, 1 November 2015

वर्दी वाला गुंडा (वेद प्रकाश शर्मा)


Vardi Wala Gunda by Ved Prakash Sharma

वर्दी वाला गुंडा वेद प्रकाश शर्मा का सफलतम थ्रिलर उपन्यास है। इस उपन्यास की आजतक लगभग 8 करोड़ प्रतियाँ बिक चुकी हैं। भारत में जनसाधारण में लोकप्रिय थ्रिलर उपन्यासों की दुनिया में यह उपन्यास "क्लासिक" का दर्जा रखता है।


डाउनलोड करें- वर्दी वाला गुंडा

कृष्ण कुंजी - अश्विन सांघी


Krishna Kunji (Krushna Key) by Ashwin Sanghi

5000 साल पहले एक चलमतकारी वयक्तित्व का जन्म हुआ था धरती पर, जिनका नाम कृष्ण रखा गया था। मानवता को भय था की यदी प्रभु कृष्ण का निधन हो गया तो बुरायी और दानव वापस से धरती पर राज करने लगेंगे, पर उनको ये विश्वास दिलाया गया कि जब भी ज़रूरत होगी, प्रभु फिर से धरती पर जन्म लेंगे - कलयुग में। नये दौर में एक गरीब लड़का जन्म लेता है और ये सोचते हुए बड़ा होता है कि वही भगवान का नया अवतार है। पर असल में वो एक सेरियल किलर है। इस पुस्तक में जहाँ शुरुअत होती है एक व्यक्ति से जो बहुत सूझ बूझ के साथ हत्या करता है, वही एक साजिश भी सामने आती है - कृष्ण कि विरासत जो वो मनुष्यता के लिये छोड़ गए थे। क्या इस विरसत का पता लगाया जा पाएगा?

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Saturday, 31 October 2015

अंतराल (महासमर भाग 5)- नरेंद्र कोहली


Antral (Mahasamar - 5) by Narendra Kohli 

‘महासमर’ का यह पाँचवा खंड है- ‘अंतराल’।
इस खंड में, द्यूत में हारने के पश्चात पांडवों के वनवास की कथा है। कुन्ती, पाण्डु के साथ शत-श्रृंग पर वनवास करने गई थी। लाक्षागृह के जलने पर, वह अपने पुत्रों के साथ हिडिम्ब वन में भी रही थी। महाभारत की कथा के अन्तिम चरण में, उसने धृतराष्ट्र, गांधारी तथा विदुर के साथ भी वनवास किया था।....किन्तु अपने पुत्रों के विकट कष्ट के इन दिनों उनके साथ में वह हस्तिनापुर मे विदुर के घर रही। क्यों ? 

पांडवों की पत्नियाँ-देविका, बलधरा, सुभद्रा, करेणुमति और विजया, अपने-अपने बच्चों के साथ अपने-अपने मायके चली गई; किन्तु द्रौपदी कांपिल्य नहीं गई। वह पांडवों के साथ वन में ही रही। क्यों ?
कृष्ण चाहते थे कि वे यादवों के बाहुबल से, दुर्योधन से पांडवों का राज्य छीनकर, पांडवों को लौटा दें, किन्तु वे ऐसा नहीं कर सके। क्यों ? सहसा ऐसा क्या हो गया कि बलराम के लिए धृतराष्ट्र तथा पांडव, एक समान प्रिय हो उठे, और दुर्योधन को यह अधिकार मिल गया कि वह कृष्ण से सैनिक सहायता माँग सके और कृष्ण उसे यह भी न कह सकें कि वे उसकी सहायता नहीं करेंगे ? 

इतने शक्तिशाली सहायक होते हुए भी, युधिष्ठिर क्यों भयभीत थे ? उन्होंने अर्जुन को किन अपेक्षाओं के साथ दिव्यास्त्र प्राप्त करने के लिए भेजा था ? अर्जुन क्या सचमुच स्वर्ग गये थे, जहाँ देह के साथ कोई नहीं जा सकता ? क्या उन्हें साक्षात् महादेव के दर्शन हुए थे ? अपनी पिछली त्राया में तीन-तीन विवाह करने वाले अर्जुन के साथ ऐसा क्या हो गया कि उसने उर्वशी के काम-निवेदन का तिरस्कार कर दिया ?

इस प्रकार अनेक प्रश्नों के उत्तर निर्दोष तर्कों के आधार पर ‘अंतराल’ में प्रस्तुत किए गए हैं। यादवों की राजनीति, पांडवों के धर्म के प्रति आग्रह, तथा दुर्योधन की मदांधता संबंधी यह रचना पाठक के सम्मुख इस प्रख्यात कथा के अनेक नवीन आयाम उद्घाटित करती है। कथानक का ऐसा निर्माण, चरित्रों की ऐसी पहचान तथा भाषा का ऐसा प्रवाह-नरेन्द्र कोहली की लेखनी से ही संभव है ! प्रख्यात कथाओं का पुनर्सृजन उन कथाओं का संशोधन अथवा पुनर्लेखन नहीं होता; वह उनका युग-साक्षेप अनुकूलन मात्र भी नहीं होता। पीपल के वृक्ष, पीपल होते हुए भी, स्वयं में एक स्वतंत्र अस्तित्व होता है; वह न किसी का अनुसरण है, न किसी का नया संस्करण ! मौलिक उपन्यास का भी यही सत्य है।

मानवता के शाश्वत प्रश्नों का साक्षात्कार लेखक अपने गली-मुहल्ले, नगर-देश, समाचार-पत्रों तथा समकालीन इतिहास में आबद्ध होकर भी करता है; और मानव सभ्यता तथा संस्कृति की संम्पूर्ण जातीय स्मृति के सम्मुख बैठकर भी। पौराणिक उपन्यासकार के ‘प्राचीन’ में घिरकर प्रगति के प्रति अन्धे हो जाने की संभावना उतनी ही घातक है, जितनी समकालीन लेखक की समसामयिक पत्रकारिता में बन्दी हो, एक खंड सत्य को पूर्ण सत्य मानने की मूढ़ता। सृजक साहित्यकार का सत्य अपने काल-खंड का अंग होते हुए भी, खंडों के अतिक्रमण का लक्ष्य लेकर चलता है।

नरेन्द्र कोहली का नया उपन्यास है ‘महासमर’। घटनाएँ तथा पात्र महाभारत से संबद्ध हैं; किन्तु यह कृति एक उपन्यास है-आज के लेखक का मौलिक सृजन !

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Sunday, 25 October 2015

इक्ष्वाकु के वंशज (अमिश)

अमिश का रामायण आधारित उपन्यास 

Ikshwaku ke Vanshaj (Amish)
मेलुहा के मृत्युंजय, नागाओं का रहस्य और वायुपुत्रों की शपथ की अपर सफलता के बाद अमिश की राम पर आधारित एक नयी श्रृंखला 

३4०० ईसापूर्व, भारत

अलगावों से अयोध्या कमज़ोर हो चुकी थी. एक भयंकर युद्ध अपना कर वसूल रहा था. नुक्सान बहुत गहरा था. लंका का राक्षस राजा, रावण पराजित राज्यों पर अपना शासन लागू नहीं करता था. बल्कि वह वहां के व्यापार को नियंत्रित करता था. साम्राज्य से सारा धन चूस लेना उसकी नीति थी. जिससे सप्तसिंधु की प्रजा निर्धनता, अवसाद और दुराचरण में घिर गई. उन्हें किसी ऐसे नेता की ज़रूरत थी, जो उन्हें दलदल से बाहर निकाल सके. नेता उनमें से ही कोई होना चाहिए था. कोई ऐसा जिसे वो जानते हों. एक संतप्त और निष्कासित राजकुमार. एक राजकुमार जो इस अंतराल को भर सके. एक राजकुमार जो राम कहलाए.

वह अपने देश से प्यार करते हैं. भले ही उसके वासी उन्हें प्रताड़ित करें. वह न्याय के लिए अकेले खड़े हैं. उनके भाई, उनकी सीता और वह खुद इस अंधकार के समक्ष दृढ़ हैं.क्या राम उस लांछन से ऊपर उठ पाएंगे, जो दूसरों ने उन पर लगाए हैं ?क्या सीता के प्रति उनका प्यार, संघर्षों में उन्हें थाम लेगा?क्या वह उस राक्षस का खात्मा कर पाएंगे, जिसने उनका बचपन तबाह किया?क्या वह विष्णु की नियति पर खरा उतरेंगे?

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Saturday, 24 October 2015

महासमर 4 (धर्म)- नरेंद्र कोहली

भीम के हाथ उठाकर अपने पीछे आते सारे लोगों को रुकने का संकेत किया। 

रुकने की आज्ञा प्रचारित होती गई और गज, अश्व तथा रथ रुकते चले गये। 

‘‘भैया ! खांडवप्रस्थ सामने दिखाई दे रहा है।’’ भीम अपने हाथी से उतरकर युधिष्ठिर के रथ के पास आ गया, ‘‘आपकी आज्ञा हो तो यहीं शिविर स्थापित कर दिया जाए। यहाँ शिविरों तथा रसोई की व्यवस्था हो और हम लोग आस-पास का क्षेत्र देख आएँ।’’

‘‘देखने को है ही क्या ?’’ युधिष्ठिर के कुछ कहने से पहले ही नकुल बोला, ‘‘चारों ओर वन-ही-वन हैं। जहाँ वन नहीं हैं, वहाँ पथरीली पहाड़ियाँ हैं, जिन पर तृण भी नहीं उगता।’’

‘‘नहीं ! ऐसी बात नहीं होनी चाहिए।’’ युधिष्ठिर की वाणी आश्वस्त थी, ‘‘कौरवों की प्राचीन राजधानी है। पुरुरवा, आयु, नहुष तथा ययाति ने यहीं से शासन किया था। यहां हमारी प्राचीन प्रासाद है। उससे लगा खांडवप्रस्थ नगर है, जहाँ हमारी प्रजा निवास करती है।’’

‘‘मुझे तो यहाँ कुछ भी दिखाई नहीं पड़ रहा।’’ भीम ने अपनी आँखों पर हथेली की छायी करते हुए दूर तक देखने का अभिनय किया।


‘‘महाराज ! यहाँ शिविर स्थापित करने का तो आदेश दे ही दीजिए।’’ कृष्ण ने कहा, ‘‘आसपास कुछ दर्शनीय है या नहीं, इससे क्या अन्तर पड़ता है।’’

‘‘हाँ !’’ अर्जुन बोला, ‘‘प्रासाद है तो 

ठीक है, नहीं तो हमें बनाना है। नगर है तो उसका पुनरुद्धार करना है, नहीं है तो बसाना है। अब रहना तो यहीं है न। महाराज धृतराष्ट्र ने हमें जो राज्य और राजधानी दी है, उसका हम अपमान तो नहीं कर सकते !’’

‘‘अर्जुन ! तुम्हारी वाणी में पितृव्य के प्रति कटुता है...।’’

‘‘मेरे मन में तो उनके प्रति घृणा है।’’ भीम ने युधुष्ठिर की बात काट दी, ‘‘मेरी समझ में नहीं आता कि आपके मन में उनके व्यवहार की कोई प्रतिक्रिया होती क्यों नहीं। उन्होंने हमारे विरुद्ध कौन-सा षड्यन्त्र नहीं रचा और तब भी आप चाहते हैं कि अर्जुन की वाणी में पितृव्य के लिए कटुता तक न आए। आप मनुष्य नहीं हैं क्या ?’’


‘‘ज्येष्ठ, मनुष्य तो हैं ही मध्यम ! किन्तु धर्म राज भी हैं। वे अकारण ही धर्मराज नहीं कहलाते।’’ कृष्ण का स्वर इस समय परिहास शून्य ही नहीं पर्याप्त गंभीर भी था, ‘‘उन्होंने अपने ‘स्व’ को जीत लिया। जिस मन में सर्वभूताय प्रेमरूपी ईश्वर होना चाहिए, उसमें वे घृणा को स्थान दें... केवल इसलिए, क्योंकि कुरुराज धृतराष्ट्र के मन में अपने भ्रातुष्पुत्रों के प्रति प्रेम नहीं है। यह तो वैसा ही हुआ कि एक व्यक्ति ने अपने घर में मल बर लिया है और वह मल यदा-कदा दूसरों पर फेंकता रहता है, इसलिए आप भी अपने घर में मल भर लें, ताकि आप भी अपनी सुविधानुसार उस पर मल फेंक सकें।’’

‘‘प्रकृति के नियमों के अनुसार स्वाभाविक तो यही है।’’ भीम ने उत्तर दिया।

‘‘किसी एक का स्वभाव ही तो मानव का धर्म नहीं है। धर्म तो प्रकृति का अतिक्रमण कर आत्मस्थ होकर ही सिद्ध होगा।’’ कृष्ण ने उत्तर दिया, ‘‘साधारण मनुष्य प्रकृति के नियमों का दास होता है मध्यम ! किन्तु असाधारण व्यक्ति का सारा उपक्रम उन नियमों का स्वामी बनने के प्रयत्न में है।’’ कृष्ण ने रुककर भीम को देखा, ‘‘अब तुम महाराज की ओर से शिविर स्थापित करने की घोषणा प्रचारित कर दो और चलो हमारे साथ। मैं तुम्हें तुम्हारा वह प्रासाद और नगर दिखाता हूँ।’’

‘‘तुम इस क्षेत्र से परिचित हो माधव ?’’ अर्जुन ने कुछ आश्चर्य से पूछा।

कृष्ण के चेहरे पर सम्मोहनपूर्ण मुस्कान उभरी, ‘‘धनंजय ! यह क्षेत्र चाहे कौरवों के राज्य के अन्तर्गत माना जाता है, किन्तु यह यमुना के तट पर, गंगा-तट पर नहीं। यमुना हमारी नही है। मथुरा, वृन्दावन, गोकुल... कुछ भी तो यहाँ से दूर नहीं है।’’


वे सब लोग कृष्ण के पीछे-पीछे चल रहे थे। अर्जुन, कृष्ण के सबसे अधिक निकट था। युधिष्ठिर, भीम, तथा बलराम उनके पीछे थे और इस प्रयत्न में थे कि कुंती और द्रौपदी भी उनके साथ-साथ चल सकें। नकुल और सहदेव सबके पीछे थे और खांडवप्रस्थ संबंधित अपनी जानकारी को लेकर विवादों में उलझे हुए थे।

झाड़ियों के बीच से बनी धुँधली पगडंडियों पर कृष्ण के पग बढ़ते जा रहे थे।...यह तो स्पष्ट ही था कि मनुष्य के चरण इन मार्गों पर पड़ते रहते हैं। नहीं तो इन पगडंडियों का अस्तित्व ही न होता। किन्तु, यहाँ न पथ थे, न राजपथ। यहाँ रथों का आवागमन नहीं हो सकता था। दस-दस अश्वों की पक्तियाँ साथ-साथ नहीं चल सकती थीं, यदि पांडवों को यहाँ रहना है तो उन्हें पथ और राजपथों का निर्माण करना होगा। भवनों, हवेलियों, अट्टालिकाओं और प्रासादों का निर्माण करना होगा। जब मनुष्य रहने लगेंगे तो उनकी आवश्यकताओं की आपूर्ति के लिए क्या नहीं बनाना पड़ता....जब यादव कुशस्थली पहुँचे थे, तो वहाँ क्या था ? यादवों ने भी तो द्वारका जैसे वैभव शाली नगर का निर्माण किया। प्रत्येक नगर को कोई- न-कोई राजा बसाता ही है, तो पांडव अपने लिए एक नया नगर नहीं बसा सकते


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चंद्रकांता संतति भाग 3 (देवकी नंदन खत्री)